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Rohan Mishra
Rohan Mishra1/6/2026

जब बेटी ही अपनी मां को वृद्ध आश्रम छोड़ने जाए और खुलेआम कह दे कि “घर में मां के लिए जगह नहीं है” — तो यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि हमारे बदलते समाज की कड़वी सच्चाई बन जाती है। अक्सर देखा गया है कि गांवों में ऐसी घटनाएं बहुत कम सुनने को मिलती हैं, लेकिन शहरों में वृद्ध आश्रम छोड़ना एक सामान्य परिपाटी बनती जा रही है। मां-बाप अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए गांव, जमीन, सुकून और अपनापन छोड़कर शहर आते हैं। पूरी ज़िंदगी बच्चों की पढ़ाई, नौकरी और सपनों में लगा देते हैं। लेकिन जब वही मां-बाप बुज़ुर्ग हो जाते हैं, बीमार हो जाते हैं, तो आधुनिक घरों में उनके लिए “जगह” नहीं बचती। यह वीडियो हमें सोचने पर मजबूर करता है — क्या विकास की कीमत रिश्तों से चुकाई जा रही है? क्या सुविधाएं बढ़ने के साथ संवेदनाएं खत्म हो रही हैं? अगर बुढ़ापा अपनों के साथ, सम्मान और सुकून से बिताना है, तो शायद शहरीकरण की अंधी दौड़ पर एक बार रुककर सोचने की जरूरत है। 👉 मां-बाप बोझ नहीं, हमारी जड़ हैं। 👉 रिश्ते किसी फ्लैट के साइज से छोटे नहीं होते।

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